जहां रूहानी परेशानी के लिए देश भर से लोग आते हैं
किछौछा शरीफ दरगाह, अंबेडकरनगर -अम्बेडकर नगर जनपद में स्थित प्रसिद्व सूफी सन्त हजरत मखदूम अशरफ की अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध किछौछा दरगाह आज भी हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समेत विभिन्न धर्मों के लाखों अनुयायियों के लिए भक्ति, आस्था व श्रद्वा का एक ऐसा केन्द्र है जहॉ दुखियारे और परेशान हाल लोग रोते हुए आते है और दर्शन करने के उपरान्त मुस्कुराते हुए अपने घरों को लौटते हैं। इसलिए इस दरगाह को रूहानी (अध्यात्मिक) इलाज का सबसे बडा केन्द्र भी कहा जाता है।
किछौछा शरीफ
प्रसिद्ध सूफी संत सय्यद मखदूम अशरफ जहांगीर अशरफी की दरगाह के नाम से भी जाना
जाता है। उनका जन्म ईरान में सेमनान में हुआ था और विशेष रूप से चिश्ती पद्धति को
आगे बढ़ाने में उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। इन संत ने बहुत यात्राएं की और
लोगों तक शान्ति का सन्देश पहुँचाया।
समरकन्द, मुल्तान, दिल्ली, विहार, बंगाल, जौनपुर होते हुए अन्त में हजरत मखदूम अशरफ किछौछा पहुॅंचे यहॉ रहकर मखदूम अशरफ ने अपने जीवनकाल में गरीबों, मजलूमों, बीमार लोगों के घावों जख्मों पर इन्सानियत का मरहम लगाते रहे। उनके आशीर्वाद और अदभुत दिब्य शक्ति से मानसिक रोगी, भूतप्रेत, सफेद दाग, दमा कोढ, समेत अन्य मरीज स्वास्थ्य लाभ करने लगे। ऐसे ही परेशान हाल लोगों के लिए हजरत मखदूम ने किछौछा दरगाह में एक गोल चौकोर तालाब की खुदाई करवाई जिसमें सऊदी अरब के मशहूर कुआं आबेजमजम से सात बार जल मगाकर उसे भरा जिसे आज नीर शरीफ कहा जाता है।
ईरान से भारत
आए हजरत मखदूम ईरान के सिमनान कस्बे में 707 हिजरी (सन 1286 ) में सूफी सन्त मखदूम अशरफ का जन्म हुआ था। बचपन से ही मखदूम
साहब फकीरी, साधुत्व व ईश्वर प्रेम में लीन रहा करते थे।
जब मखदूम साहब 15 वर्ष के थे त्यों ही उनके बादशाह पिता इब्राहिम का
स्वर्गवास हो गया था परिणामस्वरूप आपको उनका उत्तराधिकारी चुना गया कुछ वर्षों तक
राजपाट चलाने के बाद आपकी यह दिली मन्शा थी कि अपने छोटे भाई सै़ मोहम्मद को
राजसिहांसन सौंप कर ईश्वर की अराधना व तपस्या में लीन हो जाए। ऐसी मान्यता है कि
ईरान के सिमनान में एक प्रार्थना सभा स्थल पर वह इबादत कर रहे थे तभी ईश्वरीय
सन्देश प्राप्त हुआ कि राज सिहांसन का परित्याग करके ऐ मखदूम अशरफ फकीरी की मंजिल
पाने के लिए हिन्दुस्तान की तरफ कूच कर जाओ। 808 हिजरी (सन 1387) में हजरत मखदूम ने मानव जाति की सेवा करते हुए आखिरी सॉस ली
और इस दुनिया को अलविदा कहा।
हिन्दू कुम्हार
की आस्था के कारण ही इमामबाड़े के निर्माण के समय इसको मंदिर जैसा रूप दिया गया और
नाम भी कुम्हार का इमामबाड़ा रखा गया। उसी समय से आस-पास के ¨हदू भाइयों की
आस्था इमामबाड़े से जुड़ गई। मुहर्रम में जब भी इमामबाड़ा खुलता है, वहां दोनों
मजहब के लोग जुटते हैं। इसके अलावा 9वीं व 10वीं मुहर्रम का
विश्व प्रसिद्ध दूल्हे का जुलूस यहा सात बार सलामी भी देता है। आलिम हुसैन बताते
हैं कि उन दिनों अवध के नवाब शहादत हुसैन अपने पिता से नाराज होकर बनारस आ गए थे।
उन्हीं की वंशज बाराती बेगम ने कुम्हार के बेटे का इमाम हुसैन के प्रति लगाव देख
यह इमामबाड़ा बनवाया। इसकी देख रेख युद्ध-कौशल की शिक्षा देने वाले सैयद मीर हसन के
परिवार को सौंपी गई। सैयद आलिम हुसैन और उनका परिवार उन्हीं के वंशज हैं।

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